निम्नलिखित में से किसी एक का काव्य सौन्दर्य लिखिए (5):
52.
(क)
अगहन देवस घटा निसि बाढ़ी। दूभर दुख सो जाइ किमि काढ़ी।
अब धनि देवस बिरह भा राती। जरै बिरह ज्यों दीपक बाती॥
काँपा हिया जनावा सीऊ। तौ पै जाइ होइ सँग पीऊ॥
घर घर चीर रचा सब काहूँ। मोर रूप रँग लै गा नाहू॥
पलटि न बहुरा गा जो बिछोई। अबहूँ फिरै फिरै रँग सोई॥
सियरि अगिनि बिरहिनि हिय जारा। सुलगि सुलगि दगधै भै छारा॥
यह दुख दगध न जानै कंतू। जोबन जनम करै भसमंतू॥
पिय सौं कहेहु सँदेसड़ा, ऐ भँवरा ऐ काग।
सो धनि बिरहें जरि मुई, तेहिक धुआँ हम लाग॥
(ख)
जो है वह सुगबुगाता है
जो नहीं है वह फेंकने लगता है पचखियाँ
आदमी दशाश्वमेध पर जाता है
और पाता है घाट का आख़िरी पत्थर
कुछ और मुलायम हो गया है
सीढ़ियों पर बैठे बंदरों की आँखों में
एक अजीब-सी नमी है
और एक अजीब-सी चमक से भर उठा है
भिखारियों के कटोरों का निचाट खालीपन